विज्ञान के नाम पर एक बच्चे का सन्नाटा: ‘लिटिल अल्बर्ट’ का डरावना सच

Shivshakti Singh
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एक ऐसा प्रयोग जिसने इंसानी दिमाग में डर बेचा

साल 1920 की बात है। जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के दो शोधकर्ता, जॉन बी. वाटसन और रोजाली रेनेर, एक बच्चे पर एक ऐसा प्रयोग कर रहे थे जो आज भी मनोविज्ञान के इतिहास पर काला धब्बा है। उन्होंने महज 9 महीने के एक शिशु ‘अल्बर्ट’ को एक सफेद चूहे के साथ खेलने दिया। लेकिन हर बार जब अल्बर्ट चूहे को छूता, वैज्ञानिक पीछे से लोहे की एक मोटी पट्टी पर हथौड़े से जोरदार आवाज करते।

कैसे बनाया गया एक मासूम में डर?

बार-बार इस तेज आवाज के साथ चूहे का सामना करने पर, अल्बर्ट ने चूहे से डरना सीख लिया। यही नहीं, यह डर ‘सामान्यीकृत’ हो गया। अल्बर्ट सफेद खरगोश, सांता क्लॉज का दाढ़ी वाला मुखौटा, और यहां तक कि अपनी मां के फर वाले कोट से भी डरने लगा। वैज्ञानिकों ने जानबूझकर एक मासूम बच्चे के दिमाग में एक स्थायी, गहरा डर बैठा दिया था।

नैतिकता का सवाल: विज्ञान की सबसे काली घड़ी

आज के मानकों से देखें तो यह प्रयोग पूरी तरह से अनैतिक और निंदनीय है। अल्बर्ट की कोई सहमति नहीं ली गई, न ही प्रयोग के बाद उसके डर को दूर करने (डी-कंडीशनिंग) की कोई कोशिश की गई। उसका क्या हुआ, यह आज तक पता नहीं। यह केस शोध के नाम पर कमजोर प्रतिभागियों को नुकसान पहुंचाने के खतरों को उजागर करता है और आधुनिक शोध नैतिकता के नियमों (जैसे सूचित सहमति) के विकास की जरूरत को रेखांकित करता है।

विज्ञान की जिज्ञासा कभी-कभी इंसानी संवेदनाओं से ऊपर नहीं हो सकती। ‘लिटिल अल्बर्ट’ का दर्द इसी सच्चाई का एक कड़वा सबक है।

Tags: लिटिल अल्बर्ट प्रयोग, मनोविज्ञान का काला इतिहास, जॉन बी वाटसन, शोध नैतिकता

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