IBC के 10 साल: कैसे बदला भारत का कर्ज वसूली और कंपनी बचाव सिस्टम?

Shivshakti Singh
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दशक भर का सफर: IBC ने कैसे बदली कॉरपोरेट रेस्क्यू की तस्वीर?

भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) ने पिछले एक दशक में देश के कॉरपोरेट रेस्क्यू सिस्टम को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। 2016 में लागू हुए इस कानून ने कर्जदारों और लेनदारों के बीच के रिश्ते को नई परिभाषा दी। आइए जानते हैं पांच बड़े बदलाव जो IBC ने लाए।

1. समयबद्ध समाधान

IBC ने कर्ज वसूली और कंपनी बचाव के लिए एक सख्त समय-सीमा तय की। पहले जहां मामले सालों तक अदालतों में अटके रहते थे, अब 330 दिनों के भीतर रिजॉल्यूशन प्रक्रिया पूरी करना अनिवार्य है। इससे कर्जदारों को जल्द राहत मिलती है और कंपनियां बंद होने से बच जाती हैं।

2. लेनदारों को मिली ताकत

इस कानून ने वित्तीय लेनदारों (बैंकों) को सबसे आगे रखा। अब लेनदारों की समिति (CoC) ही तय करती है कि कंपनी को बचाना है या बंद करना है। इससे बैंकों का कर्ज वसूली का रास्ता साफ हुआ और एनपीए की समस्या पर लगाम लगी।

3. ‘जीरो सम’ का खेल खत्म

पहले कंपनियां कर्ज चुकाने से बचने के लिए सालों तक कानूनी पेंच फंसाती थीं। IBC ने इसे खत्म किया। अब अगर कंपनी डिफॉल्ट करती है, तो तुरंत NCLT में केस दायर होता है। प्रमोटर अपनी कंपनी पर से नियंत्रण खो सकते हैं, जो एक बड़ा बदलाव है।

4. रेस्क्यू और रिवाइवल पर जोर

IBC का मकसद सिर्फ कर्ज वसूलना नहीं, बल्कि कंपनी को बचाना भी है। रिजॉल्यूशन प्लान के जरिए कंपनी को नए निवेशकों को सौंपा जाता है। इससे कर्मचारियों की नौकरियां बचती हैं और कारोबार चलता रहता है। उदाहरण के लिए, जेट एयरवेज और भारतीय स्टील जैसी कंपनियों को इसी प्रक्रिया से नया जीवन मिला।

5. पारदर्शिता और विश्वास

IBC ने पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया। सार्वजनिक नीलामी और ऑनलाइन बोली से यह सुनिश्चित होता है कि सबसे अच्छा ऑफर स्वीकार हो। इससे निवेशकों का भरोसा बढ़ा है और विदेशी निवेश भी आकर्षित हुआ है।

हालांकि, अभी भी चुनौतियां हैं। कई मामलों में समय-सीमा का पालन नहीं होता और अदालतों में मुकदमेबाजी जारी रहती है। लेकिन कुल मिलाकर, IBC ने भारत के कॉरपोरेट रेस्क्यू सिस्टम को एक नई दिशा दी है। यह कानून आने वाले वर्षों में और मजबूत होगा, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को फायदा होगा।

Tags: IBC, दिवाला संहिता, कॉरपोरेट रेस्क्यू, कर्ज वसूली, NCLT

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