कहीं आप भी तो नहीं कर रहे अपने बच्चे की भावनाओं को नजरअंदाज?
अक्सर माता-पिता और टीचर्स किशोरों के गुस्से, चिड़चिड़ापन या एकांत पसंद करने को ‘बस एक फेज’ या ‘अटेंशन सीकिंग’ का टैग दे देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह ‘मूड स्विंग’ असल में गहरे तनाव, अकेलेपन या चिंता की चीख हो सकती है?
आज का किशोर दोहरी मार झेल रहा है: एक तरफ सोशल मीडिया का दबाव, दूसरी तरफ एग्जाम और करियर की अंधी दौड़। जब वह अपनी परेशानी बताने की कोशिश करता है, तो अक्सर जवाब मिलता है, ‘तुम्हें क्या हो गया? बस नखरे कर रहे हो।’ यही वह पल है जब उसकी आवाज़ दब जाती है और वह खुद को और अंदर की ओर धकेल लेता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि किशोरों की भावनाओं को हल्के में लेना उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। उन्हें सिर्फ एक सुनने वाले कान की जरूरत है, न कि फटकार या उपदेश की। जब तक हम उनकी बात को बिना काटे, बिना जज किए सुनना नहीं सीखेंगे, तब तक यह पीढ़ी का अंतर और गहरा होता जाएगा।
तो अगली बार जब आपका किशोर बिना बात के उदास या गुस्से में दिखे, तो उसे ‘ड्रामा’ न कहें। बल्कि पूछें, ‘सब ठीक है? मैं सुनने के लिए हूं।’ यह छोटा सा बदलाव उसकी दुनिया बदल सकता है।
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